आसक्ति में अनासक्ति की खोज ।
घिरी हुई आसक्त दुनिया मे,
चाह थी सिर्फ एक की ओर,
लेकिन ये नियती मुझे बार बार,
फेक रही अनासक्ति की ओर।
अर्जुन सी किस्मत नही मुझमे,
जो स्वयं भगवान का साथ मिले,
पर हां मांगता हूं,
कर्ण सा पौरुष मुझमे भी खिले ।
हां दिया दधीचि बनने का सुख,
और मिला सत्यता का सोज,
क्योंकि नियती ने इंगित की थी
मुझपर,
आसक्ति मे अनासक्ति की खोज।
सत्य मिलता नही दारुण वन मे,
वो होता है निर्मल मन मे विभोर,
सत्य के लिये सब एक हैं,
ना भेद वृध, तरुण या किशोर।
जो चाहते हैं नाम युग पर्यंत,
उन्हे कढ़ना होगा हर रोज़,
जीना होगा जैसे,
राम ने की थी,
आसक्ति मे अनासक्ति की खोज ।